तो भाई ,,जैसा कि मैं बता चुका हूँ ,,मैं पतंगो के पीछे बचपन से ही क्रेजी रहा हूँ और मेरी पांचवी क्लास में 24 डिसेम्बर को छत से गिरकर एक बार हाथ भी तुड़वा चुका हूँ ।
तो इस बार कॉलेज में हर साल की तरह छुट्टी थी। सुबह दस बजे करीब उठा । अब चूँकि सात नंबर में इतना अच्छा माहोल में पिछले साल ही देख चुका था ,,और दो नंबर में वैसा मज़ा नही देखा था ,,तो देर से उठा था ।
अब जब सुबह उठा तो देखा कि सामने 2ND इयर ब्लाक से कोटा ग्रुप के मंत्री ,अभय ,,और कुछ अन्य लड़के पतंग उडा रहे थे । तब मेरे पड़ोसी प्रदीप (खेरला दौसा),,ने कहा यार ,,कहा कि यार ,, अंकुर अपन भी पतंग उडाते है । मेने कहा ..ठीक है भाई ,,इसमे क्या बुराई । लेकिन पतंग लाये कहाँ से ।
मेने कहा ,,चल कालोनी में दस दस रुपये मांगते है ,,और लेके आते है । उसने कहा ,,चल ठीक है ।
सबसे पहले , में सुभी के पास गया । पहले तो आनकानी करी । तब फिर मयूर ,,मेरे और प्रदीप के दवाब में उसने रुपये दे दिए । अब मित्तल ,,लम्बू ,,मनोज से हाथो हाथ पैसे लिए ,,और दो जूनियर को बुलवाया ।
तब तक अजय और हेमंत भी मेरे रूम पर आ गए । १०० रुपए कलेक्ट हो गए थे। अब जूनियर शकल से ***लग रहे थे ।
मेने कहा ..भाई ,,में इनके साथ जा रहा हूँ। भला इसमे किसी को क्या आपति हो सकती थी ।
..
अब हम बेक गेट गए । सारी दुकाने देखू ,,पर साली पत्नाग कंही दिखाई नही दे ।डाउट हो रहा था कि कही साली *** **** पतंग कंही मिलेगी भी या नही ।
मेने जुनिओरो को कहा ,,यार भलाई के चक्कर में बुरे फंसे ,,चलो सत्कार चलो ।
अब इसी बीच रोड पर पतंग लुट रहे बच्चो से पतंग खरीदने कि कोशिश करे । हालत ये थी कि एक भी छोरा देने को तैयार नही । बड़ी मुश्किल से ,, छोरे ने तीन रुपये में तीन पतंग दी । लगा असे जैसे जंग जित ली हो ।
अब सत्कार में जूस वाला साला ,,(अरे डोसा वाले के सामने ) डोर बच रहा था . मेने चालीस रुपये की डोर खरीद कर एक जूनियर को पकडाई । अब पतंगे वंहा नही मिली । अब मैं जुनिओरो को साफ़ साफ़ अल्टीमेटम दिया ,,कैसे भी करके ,,रोड पर लुट रहे चोरो से या ,,ख़ुद लुट कर कम से कम दस पतंग लाकर दो ।
सही कह रहा हूँ ,,भाई ,,भारी किल्लत थी । भला हो ,,जुनिओरो का जो छोरो को पकड़ पकड़ कर,,भाग भाग कर ,, पतंग लाकर दी ।
अब तक 53 रुपए खर्च हो चुके थे । मेने कहा भाई ,,चलो तुम्हारे समोसे बनते है । (दरअसल ,,में ख़ुद दस बजे उठा ,,मतलब कि नाश्ता नही किया ,,समय साधे बारह हो रहा था ,,मुझे ख़ुद को भूख लग रही थी )। समोसे खाकर ,,हम कॉलेज आ गए ।
..
अब् हमने 70 रुपए बताये । ३० रुपए बाकि थे । अब मयूर खाने पीने का शोकिन है । इवन PJ मेम भी उसे कचोरी बुलाती है । वो बोला ,,यार समोसे मंगाते है । मुझे बुरा भला प्रदीप से बीस रुपए लेकर मनोज ने एक जूनियर को तो साइकल से समोसे लाने के लिए भेज दिया ,,तो दुसरे को डोर लपटने के लिए खडा कर दिया ।
साला एसा ***** था कि ,,साले ने कभी अपनी जिन्दगी में पतंग नही उडाई थी । बस ,,समझ लो उसका तो काम हो गया ।
इसी बीच मनोज मित्तल प्रदीप मेस गए । में सुभी तायल और मयूर बेसब्री से समोसे का इंतज़ार कर रहे थे । जैसे समोसे आए ।जुनिओरो को भगा दिया हम चारो दो दो समोसे उडा गए । बाकि लोगो के लिए आधा आधा रख दिया । मयूर साला उसमे से भी एक और उडा गया ।
अब जब प्रदीप लोग वापस आए । तो जबरदस्त भसड हुयी। इसी गाली गलूच ,,इसी मारा मारी,,अल्तिमेतली इसी मस्ती कि भाई ,,बस मज़ा ही आ गया ।
अब थोडी देर हमने पतंग उडाई ,,2ND YR की काटी । फिर रुक गए ।चार बजे प्रदीप और मैं नहाने की सोचे । ऊपर पानी आ नही रहा । तो नीचे सार्वजानिक टंकी (हर होस्टल में होती है ) पर जाकर नहाने की सम्भावना देखि । पानी बर्फ सा ठंडा लग रहा था ।
..अब कैसे बताऊ भाई ,,मुझे मई के महीने में नहाने से डर लगे । जनवरी में कैसे नहा लू । बुरे तरीके से फट रही थी । अब हम सोचे ..नहाये बिना गए ,,तो खाली पिली में कटवा लिया । तो फिर नहाना तो था ही ,,राम जी का नाम लेकर जैसे तैसे करके नहाये । भाई ,, नहाने का वो मज़ा ,,सिहरन का वो अहसास ,,मैं शब्दों में बयां नही कर सकता ।
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अब फिर मनोज और में पतंग उडाने लग गए । शाम को अँधेरा होने पर (लगभग सात बजे ),,पतंग तो दिखाई नही दे रही थी,,लेकिन फिर भी उदा रहे थे ,,मयूर और प्रदीप आकर लड़ने लग गए ,,क्या मज़ा आ रहा था न भाई ,,छीन कर पतंग उडाने में (जो कि अदृश्य थी ) ..क्या कहने सुभान अल्लाह ..फिर थोडी देर बाद चरखी SE सारी डोर खाली कर के डोर तोड़ दी ,,हमारी उस अदृश्य प्यारी सी पतंग को आसमान के हवाले कर दिया ,, रक्त वर्ण के गगन में विसर्जित कर दिया ,, अदभूत आनंद की अनुभूति ..
..जारी है ..समोसों का असर ..बाकि है मेरे दोस्त..
Saturday, January 17, 2009
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1 comment:
क्या भाइ बहुत मस्ति कर्ते हो हर पैसे का हिस्साब भि रखते हो वाह भाइ वाह
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