अजी भाई ,,मैं बूंदी में पला बढ़ा,,तो वंहा पर 14 जनवरी को बड़े चाव से पंतंग उडाई जाती है और उससे पहले लोहडी मनाई जाती है ।
अब जबकि मैं तीन साल से जयपुर में हूँ ,,तो यंहा भी पतंगों के पीछे लोग क्रेजी है ।
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में जब फर्स्ट इयर में था ,,तो यंहा कोई पतंगों के पीछे कोई खास माहोल नही था ।
तब में बेक गेट जाकर 5० रुपए के पतंग डोर चरखी (गिर गाड़ी) लाया था । अनुज और सोमनाथ और मेने 15 -२० पतंगे उडाई थी । बड़े मजे उडाये थे । ..तब उस साल एक दिन मैं होस्टल आठ में गार्डन पर पड़ी पतंग को उठाकर छत पर जाकर उडाने लग गया ।यंहा तक तो ठीक था ,,लेकिन तब आठ नंबर में रहने वाले सचिन बॉस (अजमेर के) ने मुझे देख लिया ,,और बुलाकर मुझे नीलेश (वही बाइक ...सांगानेर ..वाले यार) बॉस को सुपुर्द कर दिया । वो भी मेरी हिम्मत देखकर चकित थे । लेकिन मेरा तो केस बन गया था, सो ठुकना था ही ठुका भी । पर
पंतगों के शौक लिए ये कुछ भी नही था ।
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सेकंड इयर मैं सात नंबर में रहता था ,, पास मैं पीछे एक बस्ती थी । जब फौर्थ सेम में हम घर से वापस आए ,,तो कभी कभी यंहा वंहा पतंगे पड़ी देखते ।बस जैसे चिंगारी लगने की देर थी । बस जैसे मुह मांगी मुराद पुरी हो गयी ।होना क्या था ,, बस क्लास के बाद या फिर शनिवार रविवार को जब भी कभी टाइम मिलता ,,तो क्या ,,पहुँच जाते छत पर और हो जाते शुरू ।
हम लोगो में नरेश ,,देवांशु ,,मैं ,, मोहित शुरुआती दिनों के पतंगबाज़ थे । पहले पहल तो डोर को छत पर पड़ी खाली बोतल ( u know ..kiski ) पर ही लपेटी । फिर अनुज और सीपी भी आकर उडाने लगे । उन दिनों बस दो ही काम थे -एक तो क्रिकेट और दूसरा पतंग उड़ना । तो भाई..बस डोर ले कर आ गए । पतंगे तो मैं और अनुज होस्टल से ही एकठी कर लेते थे । साली ..कॉमन रूम की छत पर पतंगे बड़ी आती थी ।
तो जैसे की मेने बताया था पीछे एक बस्ती थी ।अब भाई सर्दी का समय था(u know ..jaipur ki sardi ) ,, घर के आदमी काम पर जाते थे । घर पर नीचे औरतो को ठण्ड लगे ।तो भाई ..क्या औरते और क्या बच्चे ,,सब के सब कुछ समय छत पर जरुर आते थे । अब उनके साथ हमारी उमर की नोजवान कन्याये भी ,,कभी कभी हाँ भाई ..कभी कभी ..छत पर आती थी । मस्ती बाज तो हम पहले से थे ही ..तो बस हमरे जैसन फालतू फोकट लड़को को और चाहिए ही क्या था ,,बस हो गए शुरू ,, कुछ दिन ही सही ,,जब तक इस या उस छत पर कोई दिखती तो ,, छत पर यूँ ही पतंग के बहाने बैठे रहते ,, पतंग उनके सरो पर ले जाते तो कभी कुछ प्रतीकात्मक भाषा में संदेश प्रेषित कर देते । ये सब तो उपरोक्त लोगो की मस्ती ही थी ....लेकिन आप तो मेरा नेचर जानते ही हो ,, तो बस होना क्या था ,, हमारे कॉलेज से दूसरी गली के तीसरे मकान पर बैठी एक लड़की( नाम तो मुझे पता नही ) बस यु ही अच्छी लगती थी (अब या तो अच्छी लगेगी या अच्छी नही लगेगी ,,बुरी तो बड़े मुश्किल से लगती है ..भाई )। कहने को तो पतंग उडाने जाता था ,,पर मेरा छत पर जाने का कारन तो वो ही थी ,,शायद उसके किसी एक्साम के लिए तयारी कर रही थी ,,चूँकि हमेशा हाथ में एक किताब तो होती ही थी ,, मुझे उससे क्या ,, तो बस जब वो छत पर होती ,,तभी छत पर होता ,,वरना क्रिकेट खेलता (सात नंबर गेट के पास ..तिवाडी जी ,सीपी,जोधा ,पांडे..( भाई)..और अन्य के साथ )।
वो मुझे कभी नोटिस करे ,,तो कभी नही ,,लेकिन में जारी था ,,तो बस एसे ही समय का करवा अपनी गति से हौले हौले आगे बढ़ता गया ,,संक्रांति भी आ गयी ,, लेकिन तब तक इस रूमानी कोशिशों का कोई ख़ास सार नही निकला । उस दिन जूनियर से पतंगे मंगाई और फुल धमाल मचाया ,,रंग जमाया । सीपी अनुज देव विक्रम नरेश मोहित हेमंत मनोज और दुसरे लोगो के साथ ,,भाई कैसे बताऊ ,,उस दिन कितना मजा आया ।
उस दिन के बाद मेने भी छत पर जाना कम कर दिया । पता नही या तो अब उसके एक्साम्स चालू हो गए थे ,,या फिर दिन की हलकी गर्मी में उसने छत पर आना कर दिया था ,,या राम जाने कोई बात ,, वो अब छत पर दिखती ही नही थी । सो अब मेने छत पर जाना छोड़ दिया ,,और ये सारी कवायद बस रूमानी खिलवाड़ बनकर मेरी यादों का हिस्सा बनकर रह गयी ,,इससे ज्यादा कुछ नही । और इधर मार्केट में अपना मन लगा दिया ।(u know ..r power.. citi bank 18 th of jan )..
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अब रही थर्ड इयर ,,यानी आज की बात ..अभी अंधेरे में पतंग उडा रहे है ,,जबकि पतंग दिखाई नही दे रही है ..मनोज प्रदीप मयूर अंकुर साथ साथ ..समय.... सात :दस ...जारी है ॥
(no doubt ..today was an historical day इन my life..
Wednesday, January 14, 2009
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