Saturday, January 17, 2009

मकर संक्रान्ति(3rdyr ) :;मस्ती भरा एक सुखद दिन

तो भाई ,,जैसा कि मैं बता चुका हूँ ,,मैं पतंगो के पीछे बचपन से ही क्रेजी रहा हूँ और मेरी पांचवी क्लास में 24 डिसेम्बर को छत से गिरकर एक बार हाथ भी तुड़वा चुका हूँ ।
तो इस बार कॉलेज में हर साल की तरह छुट्टी थी। सुबह दस बजे करीब उठा । अब चूँकि सात नंबर में इतना अच्छा माहोल में पिछले साल ही देख चुका था ,,और दो नंबर में वैसा मज़ा नही देखा था ,,तो देर से उठा था ।
अब जब सुबह उठा तो देखा कि सामने 2ND इयर ब्लाक से कोटा ग्रुप के मंत्री ,अभय ,,और कुछ अन्य लड़के पतंग उडा रहे थे । तब मेरे पड़ोसी प्रदीप (खेरला दौसा),,ने कहा यार ,,कहा कि यार ,, अंकुर अपन भी पतंग उडाते है । मेने कहा ..ठीक है भाई ,,इसमे क्या बुराई । लेकिन पतंग लाये कहाँ से ।
मेने कहा ,,चल कालोनी में दस दस रुपये मांगते है ,,और लेके आते है । उसने कहा ,,चल ठीक है ।
सबसे पहले , में सुभी के पास गया । पहले तो आनकानी करी । तब फिर मयूर ,,मेरे और प्रदीप के दवाब में उसने रुपये दे दिए । अब मित्तल ,,लम्बू ,,मनोज से हाथो हाथ पैसे लिए ,,और दो जूनियर को बुलवाया ।
तब तक अजय और हेमंत भी मेरे रूम पर आ गए । १०० रुपए कलेक्ट हो गए थे। अब जूनियर शकल से ***लग रहे थे ।
मेने कहा ..भाई ,,में इनके साथ जा रहा हूँ। भला इसमे किसी को क्या आपति हो सकती थी ।
..
अब हम बेक गेट गए । सारी दुकाने देखू ,,पर साली पत्नाग कंही दिखाई नही दे ।डाउट हो रहा था कि कही साली *** **** पतंग कंही मिलेगी भी या नही ।
मेने जुनिओरो को कहा ,,यार भलाई के चक्कर में बुरे फंसे ,,चलो सत्कार चलो ।
अब इसी बीच रोड पर पतंग लुट रहे बच्चो से पतंग खरीदने कि कोशिश करे । हालत ये थी कि एक भी छोरा देने को तैयार नही । बड़ी मुश्किल से ,, छोरे ने तीन रुपये में तीन पतंग दी । लगा असे जैसे जंग जित ली हो ।
अब सत्कार में जूस वाला साला ,,(अरे डोसा वाले के सामने ) डोर बच रहा था . मेने चालीस रुपये की डोर खरीद कर एक जूनियर को पकडाई । अब पतंगे वंहा नही मिली । अब मैं जुनिओरो को साफ़ साफ़ अल्टीमेटम दिया ,,कैसे भी करके ,,रोड पर लुट रहे चोरो से या ,,ख़ुद लुट कर कम से कम दस पतंग लाकर दो ।
सही कह रहा हूँ ,,भाई ,,भारी किल्लत थी । भला हो ,,जुनिओरो का जो छोरो को पकड़ पकड़ कर,,भाग भाग कर ,, पतंग लाकर दी ।
अब तक 53 रुपए खर्च हो चुके थे । मेने कहा भाई ,,चलो तुम्हारे समोसे बनते है । (दरअसल ,,में ख़ुद दस बजे उठा ,,मतलब कि नाश्ता नही किया ,,समय साधे बारह हो रहा था ,,मुझे ख़ुद को भूख लग रही थी )। समोसे खाकर ,,हम कॉलेज आ गए ।
..
अब् हमने 70 रुपए बताये । ३० रुपए बाकि थे । अब मयूर खाने पीने का शोकिन है । इवन PJ मेम भी उसे कचोरी बुलाती है । वो बोला ,,यार समोसे मंगाते है । मुझे बुरा भला प्रदीप से बीस रुपए लेकर मनोज ने एक जूनियर को तो साइकल से समोसे लाने के लिए भेज दिया ,,तो दुसरे को डोर लपटने के लिए खडा कर दिया ।
साला एसा ***** था कि ,,साले ने कभी अपनी जिन्दगी में पतंग नही उडाई थी । बस ,,समझ लो उसका तो काम हो गया ।
इसी बीच मनोज मित्तल प्रदीप मेस गए । में सुभी तायल और मयूर बेसब्री से समोसे का इंतज़ार कर रहे थे । जैसे समोसे आए ।जुनिओरो को भगा दिया हम चारो दो दो समोसे उडा गए । बाकि लोगो के लिए आधा आधा रख दिया । मयूर साला उसमे से भी एक और उडा गया ।
अब जब प्रदीप लोग वापस आए । तो जबरदस्त भसड हुयी। इसी गाली गलूच ,,इसी मारा मारी,,अल्तिमेतली इसी मस्ती कि भाई ,,बस मज़ा ही आ गया ।
अब थोडी देर हमने पतंग उडाई ,,2ND YR की काटी । फिर रुक गए ।चार बजे प्रदीप और मैं नहाने की सोचे । ऊपर पानी आ नही रहा । तो नीचे सार्वजानिक टंकी (हर होस्टल में होती है ) पर जाकर नहाने की सम्भावना देखि । पानी बर्फ सा ठंडा लग रहा था ।
..अब कैसे बताऊ भाई ,,मुझे मई के महीने में नहाने से डर लगे । जनवरी में कैसे नहा लू । बुरे तरीके से फट रही थी । अब हम सोचे ..नहाये बिना गए ,,तो खाली पिली में कटवा लिया । तो फिर नहाना तो था ही ,,राम जी का नाम लेकर जैसे तैसे करके नहाये । भाई ,, नहाने का वो मज़ा ,,सिहरन का वो अहसास ,,मैं शब्दों में बयां नही कर सकता ।
..
अब फिर मनोज और में पतंग उडाने लग गए । शाम को अँधेरा होने पर (लगभग सात बजे ),,पतंग तो दिखाई नही दे रही थी,,लेकिन फिर भी उदा रहे थे ,,मयूर और प्रदीप आकर लड़ने लग गए ,,क्या मज़ा आ रहा था न भाई ,,छीन कर पतंग उडाने में (जो कि अदृश्य थी ) ..क्या कहने सुभान अल्लाह ..फिर थोडी देर बाद चरखी SE सारी डोर खाली कर के डोर तोड़ दी ,,हमारी उस अदृश्य प्यारी सी पतंग को आसमान के हवाले कर दिया ,, रक्त वर्ण के गगन में विसर्जित कर दिया ,, अदभूत आनंद की अनुभूति ..
..जारी है ..समोसों का असर ..बाकि है मेरे दोस्त..

Wednesday, January 14, 2009

मकर संक्रांति :: कॉलेज और मेरी पतंगबाजी

अजी भाई ,,मैं बूंदी में पला बढ़ा,,तो वंहा पर 14 जनवरी को बड़े चाव से पंतंग उडाई जाती है और उससे पहले लोहडी मनाई जाती है ।
अब जबकि मैं तीन साल से जयपुर में हूँ ,,तो यंहा भी पतंगों के पीछे लोग क्रेजी है
..
में जब फर्स्ट इयर में था ,,तो यंहा कोई पतंगों के पीछे कोई खास माहोल नही था
तब में बेक गेट जाकर 5 रुपए के पतंग डोर चरखी (गिर गाड़ी) लाया था अनुज और सोमनाथ और मेने 15 -२० पतंगे उडाई थी बड़े मजे उडाये थे ..तब उस साल एक दिन मैं होस्टल आठ में गार्डन पर पड़ी पतंग को उठाकर छत पर जाकर उडाने लग गया यंहा तक तो ठीक था ,,लेकिन तब आठ नंबर में रहने वाले सचिन बॉस (अजमेर के) ने मुझे देख लिया ,,और बुलाकर मुझे नीलेश (वही बाइक ...सांगानेर ..वाले यार) बॉस को सुपुर्द कर दिया वो भी मेरी हिम्मत देखकर चकित थे लेकिन मेरा तो केस बन गया था, सो ठुकना था ही ठुका भी पर
पंतगों के शौक लिए ये कुछ भी नही था
..
सेकंड इयर मैं सात नंबर में रहता था ,, पास मैं पीछे एक बस्ती थी जब फौर्थ सेम में हम घर से वापस आए ,,तो कभी कभी यंहा वंहा पतंगे पड़ी देखते ।बस जैसे चिंगारी लगने की देर थी बस जैसे मुह मांगी मुराद पुरी हो गयी होना क्या था ,, बस क्लास के बाद या फिर शनिवार रविवार को जब भी कभी टाइम मिलता ,,तो क्या ,,पहुँच जाते छत पर और हो जाते शुरू ।
हम लोगो में नरेश ,,देवांशु ,,मैं ,, मोहित शुरुआती दिनों के पतंगबाज़ थे । पहले पहल तो डोर को छत पर पड़ी खाली बोतल ( u know ..kiski ) पर ही लपेटी । फिर अनुज और सीपी भी आकर उडाने लगे । उन दिनों बस दो ही काम थे -एक तो क्रिकेट और दूसरा पतंग उड़ना । तो भाई..बस डोर ले कर आ गए । पतंगे तो मैं और अनुज होस्टल से ही एकठी कर लेते थे । साली ..कॉमन रूम की छत पर पतंगे बड़ी आती थी ।
तो जैसे की मेने बताया था पीछे एक बस्ती थी ।अब भाई सर्दी का समय था(u know ..jaipur ki sardi ) ,, घर के आदमी काम पर जाते थे । घर पर नीचे औरतो को ठण्ड लगे ।तो भाई ..क्या औरते और क्या बच्चे ,,सब के सब कुछ समय छत पर जरुर आते थे । अब उनके साथ हमारी उमर की नोजवान कन्याये भी ,,कभी कभी हाँ भाई ..कभी कभी ..छत पर आती थी । मस्ती बाज तो हम पहले से थे ही ..तो बस हमरे जैसन फालतू फोकट लड़को को और चाहिए ही क्या था ,,बस हो गए शुरू ,, कुछ दिन ही सही ,,जब तक इस या उस छत पर कोई दिखती तो ,, छत पर यूँ ही पतंग के बहाने बैठे रहते ,, पतंग उनके सरो पर ले जाते तो कभी कुछ प्रतीकात्मक भाषा में संदेश प्रेषित कर देते । ये सब तो उपरोक्त लोगो की मस्ती ही थी ....लेकिन आप तो मेरा नेचर जानते ही हो ,, तो बस होना क्या था ,, हमारे कॉलेज से दूसरी गली के तीसरे मकान पर बैठी एक लड़की( नाम तो मुझे पता नही ) बस यु ही अच्छी लगती थी (अब या तो अच्छी लगेगी या अच्छी नही लगेगी ,,बुरी तो बड़े मुश्किल से लगती है ..भाई )। कहने को तो पतंग उडाने जाता था ,,पर मेरा छत पर जाने का कारन तो वो ही थी ,,शायद उसके किसी एक्साम के लिए तयारी कर रही थी ,,चूँकि हमेशा हाथ में एक किताब तो होती ही थी ,, मुझे उससे क्या ,, तो बस जब वो छत पर होती ,,तभी छत पर होता ,,वरना क्रिकेट खेलता (सात नंबर गेट के पास ..तिवाडी जी ,सीपी,जोधा ,पांडे..( भाई)..और अन्य के साथ )।
वो मुझे कभी नोटिस करे ,,तो कभी नही ,,लेकिन में जारी था ,,तो बस एसे ही समय का करवा अपनी गति से हौले हौले आगे बढ़ता गया ,,संक्रांति भी आ गयी ,, लेकिन तब तक इस रूमानी कोशिशों का कोई ख़ास सार नही निकला । उस दिन जूनियर से पतंगे मंगाई और फुल धमाल मचाया ,,रंग जमाया । सीपी अनुज देव विक्रम नरेश मोहित हेमंत मनोज और दुसरे लोगो के साथ ,,भाई कैसे बताऊ ,,उस दिन कितना मजा आया ।

उस दिन के बाद मेने भी छत पर जाना कम कर दिया । पता नही या तो अब उसके एक्साम्स चालू हो गए थे ,,या फिर दिन की हलकी गर्मी में उसने छत पर आना कर दिया था ,,या राम जाने कोई बात ,, वो अब छत पर दिखती ही नही थी । सो अब मेने छत पर जाना छोड़ दिया ,,और ये सारी कवायद बस रूमानी खिलवाड़ बनकर मेरी यादों का हिस्सा बनकर रह गयी ,,इससे ज्यादा कुछ नही । और इधर मार्केट में अपना मन लगा दिया ।(u know ..r power.. citi bank 18 th of jan )..
..
अब रही थर्ड इयर ,,यानी आज की बात ..अभी अंधेरे में पतंग उडा रहे है ,,जबकि पतंग दिखाई नही दे रही है ..मनोज प्रदीप मयूर अंकुर साथ साथ ..समय.... सात :दस ...जारी है ॥
(no doubt ..today was an historical day इन my life..

Saturday, January 3, 2009

Ragging ::एक यादगार अनुभव ...

हाँ भाई लोगों ..क्या यार ,,
रैगिंग की दास्ताँ बयां कर रहा हूँ ..(mn it jpr)..
भाई अपन तो साफ साफ बोले ..जिसने दी वो है जाने ..दूसरा क्या खाक जाने ..
..( i goona really miss those days :: my 1 st yr..if you are agree wid me ..tabhi padhe )..
जब मैं फर्स्ट इयर में आया था ..
डरा हुआ तो था ही ...लेकिन ये भी सोचता था कि ..ये सब दूसरो के साथ भी तो होगा ना ..
सो कभी कभी ये सोचकर दिल को दिलासा देता था ॥
वेल..मैं कॉलेज में आया ..
मेरा रूममेट ललित (lsp)केरला का था ..भाई वो ठहरा मल्लू ..उसे हिन्दी नही आवे ...और अपन अंग्रजी में जीरो थे.. तगड़ा मामला था ..तीसरा रूमी (शैलेन्द्र )तब तक डेसकी था..जैसे तैसे करके संवाद स्थापित किया ..वरना सच बोलू तो पहले लगा ..बेटा अंकुर ,,तेरी तो लग गयी ..
तो यु ही पहले दिन में अपने एक पुराने साथी के साथ ..दुसरेमाले पर बैठा हुआ था ,,,
और पहल ही दिन .. ओह भगवान् .. सीनियर्स से सामना ..
पहली बात तो ..वो गालियों से नीचे बात नही करते थे ..और पहले ही दिन ,,मुझे बजा दिया ..क्या बजाया था भाई ,,अभी तक याद है ...खैर वो तो पहला दिन था ..एक खा लिया था ..सो अब डर थोड़ा कम हो गया था ..
अगले दिन ,,गार्ड्स के साथ हम कॉलेज गए ..भाई .. वो दिन भी क्या दिन था..अभी भी ताज़ा है.
सीनियर्स ने कहा ..लाइन में चलो ..ड्रेस कोड फोल्लो करो ..gmp,,canteen ,,ccl,,backgate not allowed..बोले तो ,,लाइफ की वाट लगा रखी थी ..
जब टीचर नही होते थे .. तब क्लास में आके नचाया ,,गवाया ...और क्या क्या नही कराया ..
जब हम रस्ते में आते थे तो पूछते थे ..कन्हा से है रे .. oh .तो तू उसका बेटा है .. किसी ---garh --pur ,, (or BMG ,,MALLU ,,TAMPU ,,GULTI ) बच्चे को जानता है .. रूम पर भेज देना ..
पहले ही वीक ..2 बार back gate पर फलाना पार्क में दो बार कॉल लगी ..
उसके लिए हम लोग बहाने बना बना कर गार्ड और Caretaker को चकमा देकर बाहर जाते थे .. कॉल में सबसे LIST कन्हा है रे ..फिर नज़र तीसरे बटन पर .. नज़र उठी कि फटका पड़ा ..***** jokes याद है ..कल 5 जोके याद कर के आना ॥(जोके तो जोके होता है ..पर उनके लिए जोके २ तरह के होते थे )। भाई तुम कोई भी कहानी या जोक एक बार से शुरू नही कर सकते ..भला ये कोइ तरीका हुआ .. स्वप्न्ल prtm frz dev ghan sym sytida भी मेरे साथ ही जाते थे .. बड़ा मज़ा आता था..
पार्क में एक बार दीवार पर चढ़ कर कृष का गाना गया .. तो एक बार एक आंटी से कुत्ते का नाम भी पूछा ..तो कभी अपने count (galti) पर कोने में फटके खाए ..फिर स्कोर पर बैलेंस ..साले सीनियर .. बड़े फटके मारे ..लेकिन बाद में सोनी बेकरी पर treat भी देते थे ..(हाँ ..ये सबसे सुकून वाला पल होता था )..सीनियर्स ने एक दिन GMP पर पकड़ रखा था ..तभी साले security वाले आ धमके .. medtwl बॉस को धर लिया और फिर तो उन्हें बहुत सुनाया ..क्या हालत कर दी थी भाई ..एकदम फाड़ दी थी ..कॉलेज भी चलता रहा .. और काल्स भी ..
राखी के बाद रूम काल्स का सिलसिला ..भाई ..में लिस्ट याद करू नही .. गाना बजाना अपने को आवे नही .. ऊपर से दूसरा के ,, जोक पर हंसू अलग .. पीटना तो था ही ..कभी कारन होता था तो कभी बिना कारन ..बस .. बजा बजा के पिता गया ..पहली बार के बाद आदत हो गई थी..कॉलेज भी चलता रहा और रूम काल्स भी ..धीरे धीरे जैसे तैसे पहला सेम ख़त्म हो गया ..
जारी है ..

Friday, January 2, 2009

MY FIRST YR :: MY BATCH

मेरा पहला साल .... कॉलेज..मेरा बेच ..
..
जब
में पहली बार क्लास गया था ,,,तुम्हारी कसम भाई ,,क्या बताऊ ,,टीचर लोग आकर अंग्रेज़ी में बकबक करे अपनी अंग्रेज़ी पहले से ही जीरो थी ,, तो समझ में क्या खाक आता ,(चूंकि अपन ठहरे हिन्दी भाषी छेत्र के हिन्दी के विद्यार्थी .) पहले दिन टाइम काटने के अलावा कुछ खास ही किया ..समीप में अशोक और नेमी भी मेरी हालत में ही थे .. तो थोडी हिम्मत आई की.. भाई ..अपन यहाँ अकेले नही है
धीरे धीरे कोशिश की ..और अपनी अभी यांत्रिकी की यात्रा बस शुरू हो गयी ..

अब सच कहू तो बड़े अजीब टीचर थे एक थे कौल सर ..पता नही क्या बोलते और क्या पढ़ते थे ak vyaaas सर तो जो पढाये ,, केवल वो ही जाने फिजिक्स और सी लैंगुएज के टीचरों ने तो दर्शन ही मुश्किल से देते थे
खैर ,,बाकि बेच बड़ा मस्त था मस्ती के अलावा किसी को और कुछ सूझता नही
aieee के नियमानुसार हमारे कॉलेज में तब हर राज्य के लिए सीट्स आरक्षित थी सब लड़के नए तो थे ही ,,अपना अपना एक फ्रेंड सर्कल बना लिए थे

मींजी ,सुधीर, संभ्रांत और कुछ अन्य को जैसे क्लास से मतलब ही नही ही होता था उनकी अपनी ही दुनिया थी
कुछ लोग सीसी (one who is ....for a girl ,,this term is very common in my college ) टाइप के भी थे
तो कुछ पढाकू भी थे या यूँ कंहू कि.....किसी आम क्लास की तरह हमारी क्लास भी सब तरह के लोगों से भरी थी
..
क्लास लेने के मामले मैं बह्पन से ही बड़ा लेट लतीफ़ रहा हूँ तो से ही मैं पहले ही दिन फिजिक्स लैब में लेट पहुँचा अब f2 ( f2 was my sab batch ..actually my batch was further divided in 4 sab batches ) में उस दिन लैब पार्टनर बनाये गए थे ,,तो एक ही लड़की (जयंती:: परिवर्तित नाम) थी ,, और में सबसे लेट था ,,तो वो मेरी लैब पार्टनर बना दी गयी ..यंहा तक तो कोई खास बात नही..लेकिन मोनी और अनुज जैसे खुराफाती लड़कों ने अपने मन से कुछ बातें बनाकर फैला दी ..और फिर तो क्या आप भी जानते है ..बस लड़को को कोई बकरा मिलना चाहिए आते जाते ,,मुझे जयंती के नाम से बुलाते ,, चिढाते ,,कुल मिला कर मस्ती करते आज भी उन कमेंट्स को याद कर बस यूँ ही कभी कभी हसी जाती है
..
हमारे यंहा परीक्षा तीन पार्ट्स में होती है .. फर्स्ट मिड टर्म ,,सेकंड मिड टर्म और लास्ट एंडटर्म
अब शुरुँआत में तो पढ़े नही( i have told you reason ,,see in start ) ,,तो तत्कालीन भूत के सबसे ख़राब मार्क्स थे तब तक घर की याद मन से गयी नही थी ,, रागिंग होती थी वो अलग ,,तो सोचा करता था ..अपने गृहनगर में किसी कॉलेज में प्रवेश ले लू ,,और पराये से जयपुर को छोड़ दू
किसी तरह से मन लगाया. .अगले मिड टर्म में एक नया नुस्खा हाथ लगा चित्तिंग का
श्याम मेरा होस्टल का साथी था वो और में ,,पेपर होने से पहले ही ,,बोर्ड पर ( हमारे पेपर करीब तीन बाय तीन के लकड़ी के बोर्ड पर होते थे ) जाकर लगभग सारे फोर्मुले आदि लिख देते थे,, बीच पेपर में आंसर भी मिलाते थे
एंड टर्म में भी यही कहानी दोहराई तो बस होना क्या था ,,परिणाम अप्रत्याशित रूप से चोंकाने वाले थे
पहले मिड टर्म में बहुत बुरे स्कोर के बावजूद मेरा प्रदशन कुल मिलाकर बहुत अच्छा था ,,nine pointer के रूप में फेमस हुआ और क्लास में चौथा स्थान था (बड़ा नाटकीय सेम था )
..
दूसरा सेम भी मार्क्स के मामले में ऐसा ही था दुसरे सेम की खास बात यह थी ..इस सेम में सबसे कम पढ़ाई हुई क्लास कम होती थी ,,लैब तो हमने ही नही करी . .. कुल मिलाकर बड़ी मस्ती करी ,,और फर्जी सेम था

भावना
मेम हमारी फिजिक्स की क्लास लेती थीवो नयी थी ,, अब पहली बात तो ये कि वो जो भी बोले पढाये,,वो सब का सब हमारे उपर से जाएउपर से खुराफाती बच्चों पर उनका ज़ोर चले नही
आगे की दो रो (पंक्तिया )खालीसब के सब क्लास वाले पीछे आकर बैठ गए ..और फुल मस्ती करे
जब कोई उनकी सुने नही,, तो वो में भरी क्लास में फुट फुट कर रो दीऔर रोते रोते ,,सिसकिया लेते हुए ,,अपनी व्यथा सुनाने लगीसब के सब सकते में ,,कि भाई ,,ये क्या हुआसही में बड़ी सही घटना थी ,, लेकिन हम मस्तानो पर इस घटना का असर भला कब तक रहता ,, दो दिन तक शांत रहे , फिर वही मस्ती चालूलेकिन ,,तब तक मेम ने एडजस्ट करना सिख लिया था

एक सर थे हाँ याद आया ..मित्तल सर ,, भाई क्या सर थे यार ,,पुरे सेम जब भी उनकी क्लास करी सिर्फ़ और सिर्फ़ एक कम किया ,,नींद निकालने का (हालाँकि वो क्लास में नींद का आनंद उठाने का पहला अनुभव था,, लेकिन अब तो बस जैसे आदत सी हो गयी है )। इसमे उनका भी कोई दोष नही था ,, क्यूंकि दोपहर में खाने के बाद अगर क्लास होगी ,,तो भला लड़के क्या करे

..
चूँकि ये साल मेरा कॉलेज का पहला साल था ,,कही अनकही ढेरो यादे है हम साथियो के लिए ये यादे अनमोल धरोहर है ...शब्दों में बयाँ नही की जा सकती ,,बस महसूस की जा सकती है ... ...